कविता
दंगापीड़ित
ये भी था इक सपना,
कि समाज से लुक भी प्यार मिले...
पर मिली किताबें दुस्वारियां,
और दोस्ती के घाव मिले...
पल रहे हैं शिवरों में
जो देश का भविष्य है,
आशा थी जिसे प्रकाश की,
उन्हें बदले में अंधेरा मिले...
खुदगर्ज राजनीति के,
मासुम भी शिकार हुऎ...
क्या सोचेंगे राष्ट्रीय,
क्या समाज के लिए जियें,
बस कुंठित ना हो समाज से,
कदम कहीं..जो डगमगा गया...
दंगा या किसी विशेष जाति या सत्ता के सताए लोगों की व्यथा और उसके परिणाम बहुत घातक होते हैं, प्रशासन प्रशासन की बैठक में उन्हें दोषी ठहराया जाता है या उनकी पहचान की जाती है तो ऐसा व्यक्ति या समुदाय सत्ता, शासन प्रशासन और मानवता से कुंठित हो जाते हैं और वो बदले की आग में जलते हैं और गलत कर शेयर करते हैं।

