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सोमवार, 27 फ़रवरी 2023

लेख-भौतिकवाद, प्रकृतवाद और हमारी महत्वाकांक्षाएं

 भौतिकवाद, प्रकृतिवाद और हमारी महत्वाकांक्षाएं


सुदूर गाँव और जंगलों मे बैठा कोई बुजुर्ग व्यक्ति और उसका परिवार जो खेती बाड़ी करता है, गाय, भैंस और बकरियों चराता है,हाथ मे स्मार्ट फोन नहीं, परिश्रम कर के, दाल रोटी खा कर सो जाता है और अगली सुबह फिर वही दाल या दही रोटी खाकर रोज के काम मे लग जाता है,

पैरों में चप्पल भी नहीं होते, छोटे मोटे कांटे टूट जाते हैं पैरों मे चुभते ही, "परिश्रम कर के शरीर मजबूत बनता है और अभ्यास से दिमाग"

उसने कोई महानगर और मैट्रो सिटी नहीं देखीवो देखता है बछड़े और पिल्ले को जन्मते हुए, पशु- पंक्षियों को बतियाते हुए,

देखता है पशुओं को पगुराते हुए और चिड़ियों को दाना चुगते और घोषला बनाते और डूब जाता है खामोशी में कभी मन्द मुश्कुरते हुए कभी कुछ चिंता और बेचैनी की सिकन लिए चेहरे और माथे पर।

उसका एक धर्म है प्रकृति के साथ रहना प्रकृति के साथ जीना ,खुद का और परिवार का भरण पोषण

वो इतना जानता है कि धरती पर उसी की एक जात ऐसी है जो बोलता है, समझता है प्रतिक्रिया देता है दूसरे जीवों और प्रकृति का संरक्षण कर सकता है,

जो जैसा हो रहा है वैसा होने देता है, प्रकृति में प्रकृति के साथ रहता और जीता है, वो चाहता है धरती सदा धरती बनी रहे उसका विज्ञान अलग है।

उसे क्या पता आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस(AI-गूगल असिस्टेंट, एलेक्सा आदि),स्पेस साइंस एंड टेक, रोबोटिक्स, टेशला, चंद्रयान, मंगलयान, आधुनिक तकनीक और विज्ञान,ग्रेविटी, रोज आने वाले नए सॉफ्टवेयर और एप्प,अंतरिक्ष मलबा(अंतरिक्ष मे मौजूद 8000टन से अधिक कचरे) और रूस यूक्रेन युद्ध और इन सब के प्रभाव।


उसे कोई फर्क नही पड़ता कि हजारों, करोङो और अरबों वर्ष बाद उसके वंशज धरती पर रहेंगे या चांद व अन्य किसी ग्रह पर जाकर बसेरा करेंगे।

उसके बच्चे पढ़े आस पास के प्राइमरी और इंग्लिश मीडियम स्कूलों में, और पोते तो और बड़े और मंहगे स्कूलों में पढ़ रहे हैं।

कच्चे और घास फूस के घर ईंट और कंक्रीट के घरों में बदल रहे हैं उसी के सामने।

उसके पुर्वजों ने जिया बहुत ही साधारण जीवन तकनीक और विज्ञान के बहुत पहले और इसके बिना और अब वो भी जीता है वैसे ही सामान्य जिंदगी।

नदियां, झरने पहाड़, जंगल सब के साथ यथा स्थिति रहता है  संयमित उपभोग भी करता है।

शायद वो देखा ही नही ख्वाब बंगलों और गाड़ियों का शॉपिंग मॉल्स में खरीदारी का मैक डी, पिज्जा हट और सी सी डी के स्वाद को चखने का।

खेती और चारागाह के लिये जमीन भी कम हो रहे हैं,

सामान के बदले सामान की प्रथाएं लगभग खत्म हो गई मंहगाई उसके घरों और रोज के जरूरत की चीजों में भी घुस गई।

नमक, माचिस और पानी के सस्ते पन पर नाज था अब वो भी ब्रांडेड हो गए।

दादा दादी और नाना नानी की कहानियां, संस्कार,सत्संग  और सज्जनता से अब पेट भी नही भरा जाएगा ।

"हमे फ्यूचरिस्टिक और पैसिसनेट होना पड़ेगा।"


कुछ लोगों की महत्वाकांक्षाओं, जिज्ञासा और रुचि ने हमे हमारी ब्रह्मांड,धरती, जीवों औऱ खुद के अस्तित्व को जानने और समझने में मदद की और जीवन को आसान बनाया

बहुत सारे पूरातत्ववादी, प्रकृतिवादी और वैज्ञानिक ने पूरा जीवन लगा दिया इसे समझने में।

वर्ष 1700 के अंत तक अधिकांस लोगों का यही मानना था कि पृथ्वी 6000 वर्ष पुरानी है।

चार सौ वर्ष पहले जर्मन जियोरजियस एग्रिकोला दुनिया के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने खनन के काम को वैज्ञानिक नजर से देखा । उन्होंने अपनी सारी जिन्दगी खदानों में बिताई और जमीन के नीचे से निकले खनिजों का अध्ययन किया 

फ्रेंच प्रकृतिवादी और जीव वैज्ञानी जौरसिस कूवये ने जीवो और पौधों का वर्गीकरण किया।


स्विटजरलैंड में एक वैज्ञानिक थे जिनका नाम था गैसनर उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं जिसमें उन्होंने प्रकृति में पाई जाने वाली सभी चीजों का वर्णन किया गैसनर पहले व्यक्ति थे जिन्होंने फॉसिल (जीवाश्म ) के चित्र बनाए ।


गैसनर ने विभिन्न पौधों और जानवरों को अलग - अलग समूहों में रखा । कुछ जानवर अन्य जानवरों से मेल खाते हैं और कुछ पौधे अन्य पौधों से मिलते - जुलते हैं । शेर , चीते और बिल्लियां एक - दूसरे से बहुत मिलते - जुलते हैं वहीं लोमड़ी , भेड़िए और कुत्ते भी एक - दूसरे से बहुत मिलते - जुलते हैं । गाय - भैंस , भेड़ और बकरियों के खुर होते हैं और वे सभी घास खाते हैं और एक - दूसरे से बहुत मिलते - जुलते हैं ।


उदाहरण के लिए सींग और खुर ज्यादातर पौधे खाने वाले (शाकाहारी) जानवरों में पाए जाते हैं । किसी मांसाहारी जानवर के सींग और खुर नहीं होते । मांसाहारी जानवरों के विशेष प्रकार के दांत होते हैं जो शाकाहारी जानवरों में नहीं होते । कूवर्य की खोज के अनुसार हम किसी जानवर के शरीर के छोटे से भाग से मात्र एक दांत से भी उस जीव के बारे में बहुत कुछ जान सकते हैं ।

पृथ्वी पर उपस्थित और विलुप्त सभी जीवों को उनके गुणधर्मों के आधार पर  प्रजाति (स्पेसीज़) औऱ वंश (जीनस) में बांटे जिनसे उनके अध्ययन में आसानी हुई।

स्वीडिश प्रकृतिवादी कैरोलस लीनियस ने प्रत्येक पौधे और जानवरों को दो लैटिन शब्दों का नाम दिया जिसमे पहला शब्द उसके वंश(जीनस) और दूसरा उसके प्रजाति (स्पेसीज़) को दर्शाता है

स्तनपायी (मैमल्स) सरीसृपों ( रेप्टाइल), पंक्षी और मछलियां स्पेसीज़ का पता लगाया जा सका और इनका अध्ययन आसान हुआ।

लाइलाज बीमारियों के इलाज मिले बीमारियां का डाइग्नोसिस और उपलब्ध मेडिसिन और उपकरणों से उम्र बढ़ी, हाई स्पीड वाहनों से दूरियां कम हो गईं, टेलीफोन और स्मार्ट फोन से कम्युनिकेशन बढ़ा 

पर "अति हर चीज की बुरी है" असल में हम आदी हो गए दवाईयों के, हर काम जल्द खत्म करने के और मोबाइल फोन्स के।

चार लोग इकट्ठा बैठे तो होते हैं, पर एक दूसरे से बात करने, कुशल क्षेम पूछने और हंसी मजाक करने के बजाय व्यस्त होते हैं अपने अपने फोन में दुःख की बात तब और होती है जब हम चार लोगों में एक के पास फोन ही न हो या उसके पास जो फोन है वो स्मार्ट न हो तो वो बिल्कुल अकेला हो जाता है।

जैसे ही मेडिकल साइंस और हेल्थ केयर विकसित हुए उसी अनुपात में नई बीमारियां भी बढ़ी, दूरियां समय कम करने होड़ में हाई स्पीड और यातायात नियमों के न पालन की वजह से सड़क दुर्घटनाएं भी बढ़ी।

अब हम बहुत आगे निकल आये मशीनों और उपकरणों से घिरे हैं। हमारी इच्छाएं अति में बदलने लगी हैं, खेतों में आवश्यकता से अधिक खाद और कीटनाशक डालने लगे, परिवार में हर सदस्य को चलने के लिए खुद की गाड़ी चाहिए, हाथ पैर न चलाना पड़े इसलिए हर काम को करने की मशीन चाहिए।

खाद केमिकल्स और दवाईयां उपचार के लिए नहीं बल्कि व्यापार के लिए बनाई जा रही हैं।

हम रोज थोड़ा थोड़ा जहर खा रहे हैं खेतों में केमिकल्स और रासायनिक खादों की बोतलें और पैकेट्स के ढेर लगे होते हैं।

कंपनियां दुकानों बाजारों के साथ साथ गांवों तक जाकर मार्केटिंग और सेल करती हैं अपने प्रोडक्ट को

फिर इन जहर से उत्पादित उत्पाद(फल, सब्जियां, अनाज और दूध) भी हमारे ही हिस्से आता है जबकि समृद्धि और कंपनियों के मालिक IPM, ऑर्गेनिक और नेचुरल उत्पाद ही खाते हैं। 

हमारी अति महत्वाकांक्षाओं की वजह से प्रकृति का संतुलन बिगड़ रहा है जिसकी वजह से पर्यावरण व जमीन पर पड़ रहे दुष्परिणाम के नतीजे का भुक्तभोगी ये सीधे साधे लोग भी होंगे जो जाने अनजाने में कभी भी प्रकति के नियमो के विरुद्ध नहीं गये और प्रकृति के साथ जीवन यापन कर रहे हैं।

घरो और दफ्तरों में ए सी और कारों से पेट्रोल, डीजल और गैस के दोहन के साथ साथ पर्यावरण को नष्ट  कर रहे हैं, पृथ्वी पर प्लास्टिक और अन्य अनावश्यक कचरे का नया हिमालय खड़ा कर रहे हैं।

प्राकृतिक संसाधनों का अति दोहन सीमित संसाधनों में कमी के साथ साथ पर्यावरण को भी छति पहुंचा रहा है।

पृथ्वी पर मौजूद कुल संसाधनों (संपत्तियों) का  40-45 प्रतिशत हिस्से का उपभोग सिर्फ 2-3 प्रतिशत लोग कर रहे हैं।

प्राकृतिक संसंधनो पर सम्पूर्ण मानव जाति और अन्य जीवों का समान अधिकार है।

"प्रत्येक मानव निर्मित उत्पाद प्राकृतिक संसाधनों से ही बना होता है"

इन जैविक अजैविक संसाधनों को बनने में लाखों वर्ष लगे,

ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि इस शदी अर्थात अगले 50 से 120 वर्षों में तेल कोयला और प्राकृतिक गैस समाप्त हो जाएंगे ।

डेवलपमेंट और आधुनिकीकरण के नाम पर पिछड़े और कमजोर लोगों का हक और संसाधन छीना जा रहा है ये सब सिर्फ उन्हीं 5 से 10 प्रतिशत लोगों के लिए है।

हमारी छुधा और तृष्णा है कि भरती ही नहीं है।

हमें प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कम से कम करना चाहिए इन्हें बनने बहुत उथल पुथल और लाखों वर्ष लगते हैं।


हमें अपने कमाई का कुछ हिस्सा उनके लिए जरूर रखना चाहिए जो पिछड़े है जाने अनजाने में जिनका हक हमने कन्ज्यूम किया और जिन्हें हमारे सहारे की जरूरत है।



-श्याम नन्दन पाण्डेय

 मनकापुर, गोण्डा, उत्तर प्रदेश

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2023

शुरुआत जरूरी है

 शुरुवात जरूरी है…!!

मन में है जो, वो बात जरूरी है
छा रहा अँधेरा घोर,
अब हर चिराग जरूरी है.

बदल रही है दुनिया सारी, बदल रहा प्रकृति भी
तेज नही धीरे ही सही,
पर बदलाव जरूरी है..
झूठी शान और परंपरा का,
बहिस्कार जरूरी है..
कोई डरा रहा ,कोई सहमाँ है,
कोई मूक,कोई वाचाल यहाँ
ध्वस्त करो यह रूढ़िवाद,
अब पुनरुत्थान जरूरी है..
मंजिल मिले या हार
ये बाद में तय होगा,
ठहरे रहे बहुत,
अब प्रस्थान जरूरी है..
जो होगा सो होगा अंजाम,
मगर आगाज जरूरी है..!
कुछ भी नहीं असंभव
बस शुरुवात जरूरी है…

शुक्रवार, 27 जनवरी 2023

सफलता निजी नहीं होती(सफलता व्यापक होनी चाहिए)


बच्चों को शिक्षा के साथ-साथ संस्कार भी दें, उनका चरित्र निर्माण करें ईमानदारी और मेहनत करना सिखाएं। रिश्ते और रिश्तों की कदर करना सिखाएं ।
अच्छे संस्कार और अनुशासन पूरे समाज और राष्ट्र बेहतर और सफल बनाता है।
विश्व भर में फैल रही वैमनस्यता, अपराध और अन्य जघन्य कृतियों में हमारी अनुशासन हीनता और असभ्यता ही जिम्मेदार हैं।
सफलता प्राप्त करने के लिए अच्छी आदतें, कर्मशीलता और अनुशासित होना आवश्यक है अनुशासन हमारी उत्पादकता(प्रोडक्टिविटी) बढ़ाता है हमें सदृढ़ और व्यवस्थित बनाकर गलती की संभावना को कम कर समस्याओं का बेहतर हल ढूंढने में मदद करता है।
मार्टिन लूथर किंग ने कहा है कि अगर आप उड़ नहीं सकते तो दौड़ें, दौड़ नहीं सकते तो चलें और चल नहीं सकते तो रेंगते हुए चलें पर चलते रहें आगे बढ़ते रहें हमेशा कर्मशील रहें।
पूरी टीम अनुशासित होने से एक दूसरे का सहयोग होता है कार्य जल्द सफल हो जाता है। इसलिए किसी भी परिवार, संस्था अथवा कम्पनी में अनुशासन पर जोर दिया जाता है और अनुशासन अच्छे संस्कार से ही आते हैं जिस परिवार, संस्था, अथवा कम्पनी में लोग अनुशासित होते हैं वो उतनी ही मजबूत और सफल होती है।
एक बात जरूर याद रखनी चाहिए सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता  इसके निश्चित चरण हैं, उसे पार करना ही पड़ता है,आप को परिश्रम करना ही पड़ेगा पर्याप्त समय देना ही पड़ेगा।
कई बार आप थक जाते हैं और कोई शॉर्टकट 
या गलत तरीके से सफल होने के लिए प्रयास करते हैं 
आप भले ही सोचें ऐसा एक बार ही करेंगे दुबारा नहीं करेंगे 
और बाद में सुधार कर लेंगे परन्तु आप को उसे सुधारने का मौका नही मिलता और अनएथिकल शॉर्टकट की आदत लग जाती है। इस तरह से मिली सफलता आप को स्थाई खुशी नही दे सकती, और आप उस सफलता को मन से सेलिब्रेट नहीं कर पाएंगे, 
एक सफल व्यक्ति समय का सदउपयोग करता है उसे पता होता है कि समय सबसे बड़ी सम्पत्ति होती है किसी भी कीमत या परिस्थिति में समय को बर्बाद नहीं करता। जीवन का हर क्षण एक नई संभावना लेकर आता है और सफल व्यक्ति हर क्षण का सही उपयोग करता है वो हर क्षण वही करता है जो उसके जीवन को सुखद व उत्कृष्ट बनाये। हर क्षण खुलकर जीता है
आप ने कई बार सुना होगा जब उद्योगों या संस्थानों के द्वारा किया गया एकाउंटिंग फ़्रॉड, स्टॉक में हेर फेर और मनी लॉन्ड्रिंग जैसे गलत तरीके से धन अर्जन करती हैं या लोगों को आकर्षित करती है सच्चाई सामने आने पर वही लोग हाथ खींचने लगते हैं और शेयर्स गिरने लगते हैं। कम्पनी ढहने लगती है।
कई कम्पनियां ढह गयीं ऐसे ही ,कोई भी बिजिनेस, ट्रेड, एक्सचेंज मार्केट और खरीदार व उपभोक्ता के साथ पारदर्शिता से चलता है। 
व्यवसाय, व्यापार, संस्था व उद्योग उनके मालिक (फाउंडर) ही नहीं चलाते, सिर्फ वही उसे सफ़ल नही बनाते बल्कि संस्था या उद्योग में कार्यरत निचले तबके से टॉप लेवल तक के कर्मचारियों के संयुक्त प्रयास(कलेक्टिव एफर्ट), उत्पाद या सर्विस (सेवा) के खरीदार(कस्टमर) और  (कन्जयूमर-उपभोक्ता) सबके सहयोग से चलता है और सफल होता है।
सतत बिजनस के लिए असल मांग होनी आवश्यक है जितनी ही आवश्यक सप्लायर, सप्लाई व उत्पादन है उतने ही आवश्यक मांग, मार्केट और खरीदार व उपभोक्ता भी हैं। 
कोई भी उत्पाद आप मार्केट में कस्टमर पर थोप नहीं सकते (सेल व्हाट यु कैन मेक) ऐसा आप एक बार कर सकते हैं फिर उसको बनाये रखने और सतत होने के लिए मांग और कस्टमर (मेक व्हाट यू कैन सेल) को उसकी जरूरत होनी चाहिए और एक सार्थक वैल्यू चैन(सही समय व जगह पर सही डिलेवरी और सर्विस आफ्टर सेल) डेवलप होना चाहिए।
पूरी दुनिया मे अकेलापन और सन्नाटा सा पसरा है सब फोन और अपने काम मे व्यस्त हैं, लोग डिप्रेशन और एंजायटी से ग्रस्त हैं। परिवार अब परिवार रहा ही नहीं घंटो बैठकर बातें नहीं करते साथ मे खाना नहीं खाते पुरानी बातें याद कर के हंसी मजाक भी नहीं कर पाते।
एक पिता सदैव चाहता है कि उसके बच्चे उस से भी आगे निकले उस से भी अधिक कामयाब और सफल हों और हर सम्भव और असम्भव प्रयास करता है अपने बच्चों की परवरिश और सफलता के लिये। 
याद रखिये सफलता सिर्फ आप की ही नहीं होती बहुतों का योगदान होता है और आपकी सफलता बहुतों को प्रेरणा देती है|
किसी एक व्यक्ति के सफलता से अन्य लोगों व समाज को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लाभ अवश्य मिलता है।
और किसी की सफ़लता में यदि आपका योगदान नही है इसका मतलब ये नहीं है कि उसे सफलता यूँ ही या बिना परिश्रम के मिली है जबकि बहुत एड़ियां घिसी हैं उसने और बहुतों ने मदद की होती है और कईयों ने पीछे खींचा होता है। भाग्य भी उसी का साथ देती है जो कर्म करते हैं, मेहनत करते हैं
बात है स्वीकारने की कि अमुक व्यक्ति सफल है समृद्ध है तो जरूर उसने ईमानदारी और ततपरता से मेहनत की होगी और दूसरी तरफ सफल व समृद्धि व्यक्ति को भी ज्ञात होना चाहिए और स्वीकारना चाहिए कि सफलता की सीढ़ियों पर कुछ लोगों ने उसे सहारा भी दिया, सहयोग किया, लड़खड़ाया तो सम्भाला भी था सफलता किसी भी क्षेत्र में मिली हो अकेले व एक दिन में प्राप्त की ही नहीं जा सकती सफल होने की प्रक्रिया में आप को कई लोगों ने सहयोग किया है। अगर सब पीछे ही खींचते, तो आप सफ़ल हो ही नहीं सकते ।
इस प्रकार बिजनेस व किसी व्यक्ति की सफलता उसी तक सीमित या उसी पर निर्भर नहीं रह जाती वो व्यापक होती है निजी नहीं होती।
सफलता तभी टिकती है जब व्यक्ति अपनी विनम्रता बनाये रखता है और सीखता रहता है। और उसे निजी नहीं समझता।
कई कंपनियों के संस्थापक अब नहीं रहे फिर वो कम्पनी चल रही उसके उत्पाद या सर्विसेज लोगों तक पहुंच रहे हैं लोग नहीं रहते उनके विचार और सिद्धान्त याद किये जाते हैं।
सफलता एक प्रक्रिया है और ये चलती रहती है जब तक आप हैं और आप के बाद भी।

श्याम नन्दन पाण्डेय
मनकापुर, गोण्डा, उत्तर प्रदेश

व्यवहार ज्ञान से बड़ा होता है

 मुझे इस बात की हमेशा खुशी रही है कि मैं किसी भी परिस्थिति में रहा हूं, ग्रोथ, मचुरिटी, स्ट्रगलिंग मेरे सबसे कमजोर और सबसे ताकतवर दोस्त ( चाहे हमउम्र हो,  छोटे या बड़े) हमेशा साथ रहे हैं नए दोस्त भी बनते रहे शिशु मंदिर के दोस्त भी अभी तक कांटेक्ट में हैँ।

हाँ कुछ मित्र ज्यादा व्यस्त हैं किसी वजह से, वो सम्पर्क में नहीं आ पाते और हम भी उनकी व्यस्तता समझ कर फोन और मैसेज नहीं करते फिर भी हम जरूरत पड़ने पर सम्पर्क में  आ जाते हैं और ऐसे मिलते हैं जैसे अक्सर मिलते रहते हों।



सोमवार, 3 अक्टूबर 2022

सफलता तत्परता और मेहनत मांगती है

एक बात जरूर याद रखनी चाहिए सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता  इसके निश्चित चरण हैं उसे पार करना पड़ता है,

आप को परिश्रम करना ही पड़ेगा पर्याप्त समय देना ही पड़ेगा
कई बार आप थक जाते हैं और कोई शॉर्टकट या गलत तरीके से सफल सफल होने के लिए प्रयास करते हैं आप भले ही सोचें ऐसा एक बार ही करेंगे और बाद सुधार कर लेंगे परन्तु आप को उसे सुधारने का मौका नही मिलता वो सफलता आप को स्थाई खुशी नही दे सकती, और आप उस सफलता को मन से सेलिब्रेट नहीं कर पाएंगे, याद रखिये सफलता सिर्फ आप की ही नहीं होती बहुतों का योगदान होता है और आपकी सफलता बहुतों को प्रेरणा देती है,
किसी एक व्यक्ति के सफलता से अन्य लोगों व समाज को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लाभ अवश्य मिलता है

रविवार, 25 सितंबर 2022

गाँव शहर और हम

 



गाँव की वैश्विक स्तिथि


समूचे विश्व को परम्पराओं, सभ्यताओं और संस्कृत से अवगत कराने वाला देश भारत जाति-पाति, भेद-भाव ऊंच-नीच काला- गोरा सब को समेटे हुए अनेकता में एकता और विविधता का प्रतीक बना हुआ है हमारा देश भारत।

आज भारत मे स्मार्ट सिटीज बनाने की बात की जा रही है और कार्य भी हो रहा है लेकिन शहरों से ज्यादा गाँवों को प्यार और विकास की जरूरत है,
स्मार्ट सिटी नही बल्कि स्मार्ट गांव विकसित करने की जरूरत है।
अगर हम बात करें कुछ तथ्यों की तो

65 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है भारत मे 2011 सेंसेक्स के अनुसार 649481 गाँव हैं सबसे ज्यादा गांव उत्तर-प्रदेश (107753) में हैं उसके उसके बाद मध्यप्रदेश,महाराष्ट्र और उड़ीसा है सबसे कम गांव केंद्र शासित प्रेदेशों में हैं,
और 37439 गांवों में 2011 तक 3 जी और 4 जी सुविधा नही पहुंच सकी थी।
लगभग 23 हजार करोड़ स्मार्ट सिटीज विकसित करने को रिलीज हुये हैं इसकी आधी रकम भी अलग से प्रदान कर स्मार्ट गाँव बनाने या मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने में खर्च किये जायें तो लोग गाँव छोडकर शहरों की तरफ न भागें। और गाँव भी विकास कर सकें।

भारत ही नहीं अपितु पूरे विश्व की 54 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है।
प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत 2022 तक हर व्यक्ति को घर देने की बात की जा रही है,  योजनाएं सम्पूर्ण और सफल हो जाती हैं और जमीन पर आधी भी हकीकत दिखाई नहीं देती
ये बात अलग है कि शहरी आबादी लगातार बढ़ रही है इसका दो अर्थ हो सकता है पहला ज्यादा तर लोग शहर में रहना पसंद करते हैं, और रह रहे हैं, दूसरा कि गांव विकास कर के शहर की श्रेणी में आ रहें है। लेकिन दूसरे बात की संभावना बिल्कुल कम है
शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, विजली व पानी (फिलहाल पानी की दिक्कत गांव में शुरू से नहीं है) ग्राम वासियों की जरूरत और हक है जो उन्हें मिलना चाहिए।
गाँव में ही हमारी,  परम्परा, सभ्यता, त्योहार,सामाजिकता और एकता बसती है इसिलए कहा जाता है कि भारत गाँवो में बसता है।
खाने को अनाज, दालें, दूध घी और हमारे रोज के जरूरत की सारी चीजें गाँवो से आती हैं जो शुद्ध और पौष्टिक होती हैं
आज गाँवों की हालत घर के बुजुर्ग की तरह है जिसने सब को पाल पोस कर, पढ़ा-लिखा कर काबिल और समर्थ तो बना दिया पर अब सब अपनी जड़/बाप को ही भूल गए।
शहर तो गाँवों की संतान हैं, पहले सभी लोग , सभ्यताएं व संस्कृतियां गाँवों में ही थे क्यों कि पहले सिर्फ गाँव थे।
मनुष्य की दिनचर्या अथवा मानव समाज जो भी करता है (नियम, कानून, व्यवहार और परम्परा) और सदियों से करता आ रहा है वही उस समाज की सभ्यता और संस्कृति होती है।
और भारत की संस्कृति और सभ्यता बहुत प्राचीन और उत्कृष्ट है।
आजकल कुछ सफल और समृद्धि लोग जैसे नेता, अभिनेता और उधोगपति जो सफलता और सुकूँ के असली मायने जान चुके हैं अपने व अन्य गाँवो को गोद लेकर उनका जीर्णोद्धार कर प्राथमिक व आधुनिक सुविधाएं मुहैया कर आदर्श गांव बना रहे हैं पर कुछ लोग दिखावे के लिए गाँवो को गोद ले रहें हैं और गांव की हालत पहले जैसी ही हैं।

क़ृषि और पशु पालन 

गांवों की बात होती है तो खेती और किसानों का जिक्र जरूर आता है। जो हमें जीवित रहने के लिए अनाज, फल, सब्जियां और दूध देने के साथ साथ स्वच्छ हवा के लिए पेंड-पौधे लगाते हैं।
पर आज गाँव और किसान की दुर्दशा है, सालों से लाखों किसान आत्महत्या कर चुके हैं
क्यों कि वो कृषि, और परिवार के भरण-पोषण, स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए बैंक से लिया कर्ज नहीं चुका पाये और आत्महत्या ही अंतिम उपाय लगा उन्हें।
बहुत से किसान और बाप इसलिए भी मर गए या मेरे जा रहें हैं कि उनका कोई सहारा नहीं है जिन सन्तानो के लिए दिक्कतें झेले और कर्ज से दबे हैं उसे तो कुछ पता ही नहीं उसके सपने कुछ और हैं और वो किसी और दुनिया में है।
गाँवो और किसानों की दुर्गति के जिम्मेदार हम सब हैं खासकर पढ़े लिखे लोग जो जो गाँवो पैदा हुए खेले और बड़े हुए पर गांव से मोह नहीं लगा पाए।

मेरा अनुभव 

एक बात और जो मैंने देश के विभिन्न राज्यों के गाँव मे घूमकर, रहकर व गांव वालों से बात कर के जानी है, कि स्कूल, और अस्पताल के साथ-साथ मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारे भी आवश्यक हैं और लोगों ने इन धार्मिक जगहों की उपयोगिता बताई कि इन्ही जगहो पर हम विशेष अवसरों पर इक्ट्ठा होते हैं, अपने विचार और सुख-दुख साझा करते हैं, यही हमारे परंपराओ और एकता को बनाये हुए हैं,
गांव के लोगों ने बताया गाँव मे किसी को कैंसर हो गया था इलाज का खर्च बहुत ज्यादा था पर गाँव के लोगों ने इलाज का खर्च और अन्य सुविधाओं में सहयोग कर के उसे मौत के मुंह से निकाल लाये।
किसी के बच्चे की उच्च शिक्षा में गांव वालों ने पूरा सहयोग दिया और वो लड़का आज बड़े ओहदे पर है पर इस बात का उस बाप को अफसोस है कि जिसके लिये उसने रात दिन मेहनत की खुद कमियों में जीकर उसे हर सुविधा दी गाँव वालों ने साथ और सहयोग दिया वो गांव को भूलकर शहर की चकाचौंध में लिप्त है।
हमने अक्सर देखा और सुना है कि बड़े शहरों में लोग अपने घरों में मर जाते हैं लोगों को पता नहीं चलता और पड़ोसी को भी तब पता चलता है जब लास से दुर्गंध आती है। शहरों में कंधे देने को लोग नहीं मिलते लेकिन गांवों में प्रार्थना और सहयोग से मरते हुए को यमराज से छीन लेते हैं।

पर इन सब मे बेचारे शहर की क्या गलती वो तो अपनी जगह है बिना हिल-डुले, स्तब्ध और निःशब्द पर कुछ तो गलत है और वो हैं हम और हमारी सोच पढ़ लिख कर काबिल बनकर गाँवो को पिछड़ा और असुविधाग्रस्त मानकर वहीं छोड़ देते हैं, और सब भूलकर शहर की 24 घण्टे बिजली, पानी और अन्य सुविधाओं के साथ AC चालू कर के दिन भर की रेस खत्म कर के आराम से रहते हैं।
हम ये भूल जाते हैं कि हमारा पेट गांवों से आये अनाज, फल व सब्जियों से भरता है यदि इन सब का उत्पादन बंद हो जाये तो हमारे पैसे और सुविधाएं धरी की धरी रह जायँगी, पैसे और सोना चांदी हम खा नहीं सकते।
अगर इन्हें खाना शुरू कर दें तो हमारा पेट इसे पचा नहीं पायेगा जबकि सोना चांदी, लोहा, जस्ता और सब खाते हैं अनाज, फल और सब्जियों के माध्यम से।

गाँव के लिए कुछ अच्छा जरूर करें 

इसलिए गाँवो और किसानों के विकास और उनको बेहतर बनाने के लिए आप सदैव सजग ततपर रहें। इस भागती दौड़ती दुनिया और जीवन में रूक कर सोंचे और इन्हें समय और सहयोग दें।
हमारे बाद भी लोग रहेंगे हमारे अपने रहेंगे इसलिए इस धरती पर्यावरण और अपनों के लिये कुछ अच्छा कर के कुछ अच्छा छोड़ कर जाना हमारा लक्ष्य होना चाहिए।



गुरुवार, 11 फ़रवरी 2021

कविता-स्थिरता

 स्थिरता (स्थायित्व)

   

ब्रह्मांड का हर कण दूसरे कण को आकर्षित अथवा प्रतिकर्षित करता रहता है सतत..


ताप, दाब और सम्बेदनाओं से प्रभावित

टूटता-जुड़ता हुआ 

नये रूप अथवा आकार के लिए लालायित,

अस्तिथिर होकर 

अस्थिरता से स्थिरता के खातिर तत्तपर..

दूसरे ही छन नए स्वरूप

और पहचान की कामना लिए विचरित करता है 

वन के स्वतंत्र हिरण की भांति 

अपनत्व को खोजते हुए 

अंधेरों और उजालों में..


थक-हार कर ताकने लगता है 

ऊपर फैले नीले-काले व्योम में दूर तलक

एक ऐसी यात्रा की सवारी 

जिसका अंत सिर्फ अनन्त है,

चलायमान है नदियों की नीर की तरह 

जो सूख जाती हैं हर वैशाख तक अब..

सहता रहता है कुदरत के धूप-छांव

और दुनिया के रीतोरवाज..,

लड़खड़ाता-संभालता और 

उलझता, सुलझता हुआ

छोटे-बड़े कदमो से बढ़ता रहता है 

स्थिरता की ओर..

तिनके से अहमब्रम्हाष्मी की विभूति तक..,

असंम्भव अभिलाषा लिए एक जातक की भांति

नीति अनीत विसार कर

सगे-सहगामी को विलग कर

अंततः संस्मरण और कल्पनाओं की

 अस्थायी स्थिरता का आलिंगन करता है।

   - श्यामजी

कविता-दंगा पीड़ित

 कविता  दंगापीड़ित ये भी था इक सपना, कि समाज से लुक भी प्यार मिले... पर मिली किताबें दुस्वारियां, और दोस्ती के घाव मिले... पल रहे हैं शिवरों...