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रविवार, 28 जनवरी 2024

प्रतिभा बनाम क्षमता और सफल जीवन का राज


आत्म बोध 

जीवन को अधिक, स्पष्टता,  उद्देश्य और जुनून के साथ जीने की इस यात्रा को आत्म-बोध कहा जाता है। हमें हमारी मानवीय क्षमता को समझना इसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। 
अपनी क्षमता का विकास करना एक सक्रिय प्रक्रिया है जो जीवन भर चलती रहती है
अपने काम का सम्मान करें 
आप जो काम कर रहे हैं उसे पूरे मन और सम्पूर्णता से करें उसमें आत्म सम्मान और और गर्व महसूस करें। याद रखें कि यह यात्रा आपके लिए है, किसी और के लिए नहीं।
रोज कुछ नया सीखें और अभ्यास करते रहें
ज़ब आप रोज कुछ सीखते हैँ  रोज अभ्यास करते है खुद को व्यस्त रखने के साथ साथ इनर वर्क करते हैँ  तो आप अधिक केंद्रित, उत्पादक, रचनात्मक पाएंगे  कम थके हुए पाएंगे और अपना बेस्ट या सर्वश्रेष्ठ दे पाएंगे
अपनी प्रतिभा के साथ साथ क्षमता का भी आकलन करें
हमारी क्षमता की कोई सीमा नहीं है। व्यावहारिक अर्थ में, मस्तिष्क हमारे पूरे जीवन तक बढ़ता और बदलता रह सकता है जो हम सोच सकते हैँ उसे साकार भी कर सकते हैं|
एक अच्छा प्रबंधक अच्छा कोच और अच्छा प्रेरेक आपकी प्रतिभा के साथ साथ आपकी क्षमता को भाम्प लेता है और उस कार्य और अभ्यास करने को उकसाता है और आप बेहतर करने लगते हैँ और क्षमता के अनुरूप कार्य मे सफल होतेहै
प्रतिभा बनाम क्षमता
प्रतिभा आपकी प्राकृतिक, स्वाभाविक या जन्मजात क्षमता है व्यक्तिगत योग्यता है जो आप के पास है
जबकि क्षमता या पॉटशियल क्षमता भविष्य को संदर्भित करती है। प्रतिभा वर्तमान को आप भविष्य कितना अधिक कर सकते हैं ये आपकी क्षमता है पॉटशियल है |
जीवन सार्थक करने के लिए लक्ष्य निर्धारित करें


आपके जीवन में यदि कोई लक्ष्य नहीं है तो कोई भी आपका सम्मान नहीं करेगा समझ में इस व्यक्ति का सम्मान होता है जो जिसके लक्ष्य होता है और निरंतर कार्यरत होता है
पर लक्ष्य के पीछे भागते-भागते हम सुख और शांति भी खो देते हैं सबसे पहले तो हमें खुद को पहचानना चाहिए हमारी क्षमताओं का आकलन होना चाहिए
लक्ष्य निर्धारित करने का अर्थ यह नहीं है कि आप कोई कोई भी बड़ा लक्ष्य पूजा लक्ष्य बना ले हैं और उसी के पीछे लग जाए लक्ष्य अपनी क्षमताओं के हिसाब से रखें यदि बड़ा लक्ष्य भी है तो उसे टुकड़ों में तोड़े पर्याप्त समय समय रखें ताकि आपको कोई जल्दबाजी न रहे और निराश ना हो लक्ष्य पूरा न होने पर बहुत तनाव होता है इसलिए छोटे-छोटे लक्ष्य बनाएं एक बड़े लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हमेशा सकारात्मक रहे हैं पॉजिटिव सोचें ऐसा भी होता है या ऐसा भी समय आता है कि जब हम अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाते इसका अर्थ यानी कि अपने प्रयास ही नहीं किया या आप कुछ भी हासिल नहीं कर सकते सपना टूटने पर आप सपने देखना बंद ना करें सपने देखते रहें यह नहीं तो कोई और सही कोई दूसरा लक्ष्य बनाएं उसे आप जरूर प्राप्त कर लेंगे कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है

रविवार, 7 जनवरी 2024

प्रतियोगिता और जीत-हार जीवन का हिस्सा है

 प्रतियोगिता अर्थात कॉम्पिटिशन शादियों से से चलता रहा है कभी  उत्तराधिकारी चुनने, वर  चुनने का या फिर कोई अधिकारी या  नेता का चुनाव हो प्रतियोगिताएं होती रहतीहैं

मौजूद विकल्प में से किसी एक को चुनना बेहतर का चुनाव करना प्रतियोगिता का उद्देश्य होता है, प्रतियोगी  परीक्षाओं में  किसी एक सीट के लिए सौ से हजार लोग कॉम्पटीकरते हैं , फाइट करते हैं मिलती सिर्फ एक को है इसका मतलब ये नहीं कि बाकी 99 या 999 प्रतियोगी बेकार है सौ या हजार में से 10 से 100 लोग ऐसे होते हैं जो उस सीट को डिजर्व करते हैं जिसे मिली है उनके बराबर योग्यता रखते हैं पर इस बार अवसर उन्हें नहीं मिला अगली बार जरूर मिलेगा इसलिए हतोत्साहित हुए बिना रिस्टार्ट करें |
जो हारते,फेल होते  हैं या जिनको पद नहीं मिलता उनको समझना  चाहिए कि  खुद को सुधारने अधिक तैयारी और भूमिका बनाने और सीखने का समय मिला है
मंज़िल तक पहुंच कर भी न मिलना बहुत कष्ट देता है पर निराशा से कुछ नहीं हासिल होता अगले अवसर के लिए जुट जाएं  अगला अवसर आप को ही मिलेगा |
बहुत लोगों की कहानियां आप ने सुनी या पढ़ी होगी किसी फील्ड में चीज के लिए  1 साल 2 साल और 5 साल लगा दिए फिर उन्हें मिली कई लोगों नहीं इतने सालों में भी ĺनहीं मिली और  वो हार  नहीं  माने किसी दूसरे फील्ड में अच्छा कर रहें हैं  और सफल हैं
गोपाल दास नीरज जी की कविता की ये पंक्ति हमेशा याद रखिए
कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है

और हरिवंशराय बच्चन जी की कविता
जो बीत गई सो बात गई

अम्बर के आनन को देखो
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
जो छूट गए फिर कहाँ मिले
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अम्बर शोक मनाता है
जो बीत गई सो बात गई
#competition #lifestyle #karma

मंगलवार, 2 जनवरी 2024

दया, धैर्य, विनम्रता और सहनशीलता जीवन का मूलमंत्र है

एक शेर की वीरता तब और बढ़ जाती है जब भटक के आये हुए मेमने को दुलारकर पुचकार कर छोड़ देता है उस पर दया दिखता है
दया और सहनशक्ति हमें शक्तिशाली बनाती है
हिन्दी मीडियम के 11th क्लास इग्लिस सब्जेक्ट में विलियम सेक्सपियर की कविता थी मर्सी आप मे से बहुतों ने पढ़ी होगी जो 12th हिंदी मीडियम से पास हैं वो पढ़े होंगे जो 12th की के इंग्लिश सब्जेक्ट में शेक्सपियर के एक प्ले (नाटक) मर्चेन्ट ऑफ वेनिस का हिस्सा है जिसके प्रमुख पात्र एंटोनियो, पोर्शिया बासियानो औऱ सायलाक हैं पोरशिया सायलाक को मर्सी मतलब दया के बारे में बताती है वो बताती है दया देने वाले और प्राप्त करने वाले दोनों को सुख देता है और  भला करती है यदि दया एक राजा के ह्रदय में प्रेवेश करा दिया जाए तो वो धरती पर भगवान की तरह हो जाएगा। विनम्रता, धैर्य सहनशीलता और दया जीवन का मूलमंत्र है

विद्या ददाति विनयम
गहरा जल शांत होता है और फलों से लदे हुए पेड़ झुके होते हैं
अष्टावक्र ने कहा है जिसमें विनय नहीं वह विद्धवान नहीं।

सहनशीलता एक ऐसा सत्य है, जिससे प्राय: सभी लोगों को अपने जीवनकाल में रू-ब-रू होना पड़ता है। सहनशील होना एक गुण है, जिससे जीवन का वास्तविक विकास होता है।
सहनशीलता दया और त्याग परिवार से सीखने को मिलता है आज हमारे जीवन में दुख और तनाव हावी हैं। इसका परिणाम यह है कि हम थोड़े से कष्टों से शीघ्र घबरा जाते हैं, क्रोधित हो जाते हैं।
और क्रोध  मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है ।

सहनशील व्यक्ति बिगड़ते कार्य को भी संभाल ले जाते हैं। इसके विपरीत जिसमें सहनशीलता नहीं होती, उसे क्रोध आता है। क्रोध में बनते हुए कार्य भी बिगड़ जाते हैं। सहनशीलता का गुण व्यक्ति को तभी मिलता है, जब उसके अंदर अच्छे संस्कारों का समावेश हो

सोमवार, 11 दिसंबर 2023

जीवन क्या है, जीवन का उद्देश्य, जीवनशैली व सफल और सार्थक जीवन का राज


कुछ शब्दों, चीज़ों या विषयों को परिभाषित करना मुश्किल है
जैसे प्रेम, मित्रता और जीवन 
इन शब्दों का कोई सार्वभौम परिभाषा नहीं है।
इस लेख में बात करेंगे जीवन पर विशेषता मानव जीवन पर 
जीवन की परिभाषा लंबे समय से वैज्ञानिकों और दार्शनिकों के लिए एक चुनौती रही है। यह आंशिक रूप से इसलिए है क्योंकि जीवन एक प्रक्रिया है, पदार्थ नहीं। यह जीवों की विशेषताओं के ज्ञान की कमी से जटिल है।
जीव विज्ञान के अनुसार जीवन की विभिन्न संस्थाओं को प्रायः खुले तन्त्र के रूप में माना जाता है जो समस्थापन को बनाए रखते हैं, कोशिकाओं से बने होते हैं, एक जीवन चक्र होता है, चयापचय से गुजरता है, बढ़ सकता है, अपने पर्यावरण के अनुकूल हो सकता है, उद्दीपकों का प्रतिक्रिया दे सकता है, जनन कर सकता है और कई पीढ़ियों से क्रम विकसित हो सकता है। बात करते हैं मनुष्य के जीवन की उसके पहलुओं, उद्देश्य और  सार्थक और सफल जीवन की कुछ दार्शनिकों और विशेषज्ञों ने कुछ सटीक परिभाषाएँ दी हैं जो  काफी हद तक ठीक है पर हर स्थिति या हर व्यक्ति के लिए सही नहीं बैठती।
अगर आप गूगल करेंगे तो पाएंगे जीवन का  अर्थ-"जीवित दशा",  जीवित होना या ज़िंदगी।
जीवन एक कैनवस है जिसे आप अपने सपनो से भरते हैं।
चलना ही जीवन है अर्थात जीवन एक यात्रा है, सीखना ही जीवन है, जीवन एक संघर्ष है । असल मे जीवन ये सब है इन सब का समुच्चय है ।
एक बेघर, बेरोजगार और उसके परिवार के लिए  जीवन अर्थ दो बार  के भोजन और  तन ढकने के कपडे और अगला दिन फिर इसी  कार्य  में लगने से ज्यादा कुछ नहीं ।
किसी बीमारी से जूझ रहे या मरणासन्न व्यक्ती के लिए सांसे चलती रहे और जल्द स्वस्थ होना ही जीवन है। 
समान्य आदमी जिसके बेसिक नीड्स पूरे हैं उसके लिए जीवन का मतलब सपने देखना और उसे पूरा करने का संकल्प और संघर्ष है जीवन ।
वहीँ जिसके पास पहले से सब कुछ है अच्छा व्यवसाय, बंगले, गाड़ियां और बैंक बैलेंस उसके लिए जीवन आसान और मौज मस्ती है भोगना ही जीवन है।
कोई सब कुछ छोड़कर संन्यास में जीवन ढूंढता है।
हर व्यक्ति और स्थिति के लिए जीवन की अलग परिभाषाएं हैं एक ही व्यक्ति अलग अलग स्थिति में जीवन को अनुभव और परिभाषित करता है ।
जीवन का हर दिन  अप्रत्याशित, अद्भुत और अकल्पनीय है 
हमारे सोचने, समझने और मानने पर भी जीवन  निर्भर कर्ता है 
हम जैसा सोचते हैं वैसा बन जाते हैं और हमारा जीवन वैसे ही बन जाता है।
जीवन का अर्थ है  सचेत होना, चेतना 
अपनी क्षमता के अनुसार दुनिया को कुछ दे जाना। अपने जन्म को सार्थक करना, मानव जन्म को व्यर्थ न जाने देना।



जीवन मे  बैलेंस  अर्थात संतुलन बहुत जरूरी है बचपन मे हम सब ने  सूयी धागा और मूंह में चम्मच दबाकर उसमें कंचे रखकर दौड़ में हिस्सा लिया होगा इस दौड़ में एक फिनिशिंग लाइन होती है ।सूयी में धागा डालते हुए या  चम्मच पर कंचे या नींबु रखकर मुंह मे दबाकर दौड़ना होता है सबसे पहले फिनिशिंग लाइन पहुंचने वाला नहीं जीतता बल्कि वो जीतता है जो सूई में धागा डाल देता है या चम्मच से कंचे गिराए बिना फिनिशिंग लाइन पर सबसे पहले पहुंचाता है विजेता वहीं होता है 
आप सफल  तभी हैं जब पद प्रतिष्ठा और पैसे के साथ साथ परिवार स्वास्थ्य, रिश्तों  और समाज में भी संतुलन बनाए रखते हैं ।
जापानी लेखक हेक्टर गार्सिया और फ्रांसिस मिरेलस द्वारा लिखी गयी पुस्तक इकिगाई जिसका अर्थ है सार्थक जीवन या उद्देश्य पूर्ण जीवन, जिसमें जापान के दक्षिण इलाके के टापू ओकिनावा के लोगों के जीवनशैली पर विस्तार से लिखा और समझाया है। दुनिया के सबसे स्वस्थ और लम्बी उम्र के लोग यहाँ रहते हैं। इस पुस्तक में जीवन को समझने और इसे सार्थक और उद्देश्यपूर्णपूर्ण बनाने पर चर्चा की गई है।
इकिगाई के अनुसार जब हम 20 की उम्र पार करते हैं  तभी से हमारे न्यूरॉन्स ( दिमाग की पेशियां या नर्व सेल्स )वयस्क होने लगती है बौद्धिक व्यायाम, जिज्ञासा और सीखने की इच्छा इत्यादि चीजों की वजह से न्यूरान्स के वयस्क होने की प्रक्रिया धीमी पड़ने लगती है जिस से हमें सकारात्मक नजरिया व ऊर्जा मिलती है और हमारी उम्र लम्बी होती है।
अपने मन और शरीर को को सक्रिय रखना एक स्वस्थ और 
लंबी उम्र का मंत्र है। 
प्रकृति का हर उत्पादन अदुतीय है और उसकी अपनी उपयोगिता है।
हम में से हर किसी के पास असाधारण और महान कार्य करने की क्षमता है, हम उस महान लक्ष्य को प्राप्त करेंगे या नहीं यह इस पर निर्भर नहीं करता कि हम किस परिस्थिति में हैं बल्कि इस बात पर निर्भर करता है कि हम उस परिस्थिति में क्या निर्णय लेते हैं ।
जीवन सफल और आसान बनाने के लिए आवश्यक है हम सामाजिक रहें ,जिम्मेदारी लेकर निर्णय लें
 समस्याओं को सुलझाने की क्षमता या कुशलता सीखें
 एडजस्ट ( सामंजस्य) करने की क्षमता वा कुशलता विकसित करें, यही जीने का तारिका है ।
जीवन सुख-दुःख का संगम है और प्रकृति हमें सर्वाइव करना सिखाती है संधर्ष करना सिखाती है जीवन संघर्षो की एक शृंखला है ।
अच्छे समय, खुशियों और उपलब्धियों के साथ-साथ विषम परिस्थितियां, प्रतिकूलतायें और दुःख भी आएगा ये जीवन का हिस्सा है। याद रखें जो टूट कर विखरते हैं वही मसीहा बनकर निखरते हैं l

श्याम नन्दन पाण्डेय
मनकापुर, गोण्डा
   उत्तर प्रदेश

शुक्रवार, 15 सितंबर 2023

असमानतायें, जीवनशैली और गरीबी

 *असमानताएँ, जीने के तरीके और गरीबी का दंश*

आप को सजग और बारीकी से देखने की जरूरत है अपने आस पास और अपने चारों ओर, सीखने और उसके इम्प्लीमेंटेशन से परिपक्वता आती है और सफलता मिलती है। हम टाटा, बिरला बिलगेट्स ,अदानी अम्बानी , बिलगेट्स, एलन मस्क, मार्क जुकरबर्ग और दूसरे सलिबर्टीज़ को देखते हैं उनके जैसा बनना चाहते हैं कोई भी गरीब बनना नहीं चाहता।

थोड़ा कम सोच पाते हैं तो अपने आस पास या शहर के सबसे अमीर आदमी के जैसे जीवन जीना चाहते हैं हम में से कई मेहनत, ईमानदारी और लगन से सफल हो जाते हैं अमीर हो जाते हैं।जबकि हमारे आस-पासबहुत सारे गरीब लोग होते हैं कुछ तो अति गरीब और भीख मांगते हैं। कम से हारने पर या असफल होने पर तो  सोचते होंगें कैसे मुश्किल से हमारे आस-पास वो गरीब और अति गरीब परिवार रहता है।

अगर आप दोनों परिस्थितियों में उन्हें याद रखते हो और सफल होने के दौड़ में शामिल होने के साथ-साथ उनके भलाई के लिए भी सोच रहे है और अवसर ढूंढ कर मदद करते हो तो आप मनुष्य हैं आप जीवित हैं।

जन्मदिन और अन्य अवसरों पर केक मुंह और कपड़ों पर पोतने और खाना बर्बाद करने की जगह अपने आस पास के जरूरतमंदो को भेंट दें।

ये लेख शायद आप को किसी निष्कर्ष पर न छोड़े इसका निस्कर्ष आप को खुद तय करना है।

 हो सकता है आप मे से अलग-अलग लोग इस लेख से अलग-अलग निस्कर्ष पर पहुंचे मोरल और ऑफ द आर्टिकल आप ही तय करें।(यथा दृष्टि तथा सृष्टि )

जुलाई माह में लगभग 30 बॉलीवुड फिल्में  और 4 फिल्में हॉलीवुड की  और बॉलीवुड से ज्यादा तमिल (कॉलीवुड) और ऐसे ही तेलगु (टॉलीवुड)और कन्नड़ फिल्में भी देश मे रिलीज हुई।

अगस्त माह में लगभग 40 फिल्में  बॉलीवुड और हॉलीवुड की 2 फिल्में और बॉलीवुड की लगभग दूनी फिल्में तमिल और 10-15 ही तेलगु और कन्नड़ की फिल्में रिलीज हुई 

जुलाई मे रिलीज कुछ बड़ी बॉलीवुड फिल्में  रणवीर और आलिया की रॉकी और रानी की प्रेम कहानी,रवीना टंडन और मिलिन्द सोमद की वन फ्राइडे नाईट, वरुण धवन और जाहनवी कपूर की बवाल बॉलीबुड

नागा शौर्य स्टाटरर तेलगु फ़िल्म रंगाबाली

हॉलीबुड की मिशन इम्पॉसिबल-7 और ओपेनहायमर दोनों फिल्मों का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन लगभग 80 करोड़ के ऊपर पहुंच चुका है अगस्त अंत तक और गदर-2 (बॉक्स ऑफिस कलेक्शन लगभग 450 करोड़ अगस्त अंत तक)

अगस्त की बॉलीबुड की बड़ी फिल्मों में ओएमजी-2(बॉक्स ऑफिस कलेक्शन लगभग 150 करोड़ अगस्त अंत तक) और गदर-2 (बॉक्स ऑफिस कलेक्शन लगभग 350 करोड़ अगस्त अंत तक) रजनीकांत स्टारर तमिल फिल्म जेलर (बॉक्स ऑफिस कलेक्शन लगभग 350 करोड़ अगस्त अंत तक), 50 करोड़ से 100 करोड़ तक कमाने वाली फिल्मों जिक्र ही नहीं कर रहा हूं।

ये सारा कलेक्शन (घरेलू है) भारत मे हुआ है। अगर 100 करोड़ तक की फिल्मों का भी एवरेज देखें तो और एवरेज 50 करोड़ मान लें तो इस अम्ब्रेला के अंदर लगभग 20 फिल्में होंगी और माह  में एक हजार करोड़ होगा और अगस्त की 100 करोड़ से अधिक की कमाई करने वाली फिल्मों की कुल कमाई का एवरेज एक हजार करोड़ से ज्यादा होगी मतलब लगभग 2 हजार करोड़ हम लोगों ने फिल्म इंडस्ट्री को दे दिए एक माह में साल भर में 24-25 हजार करोड़ फ़िल्म इंडस्ट्री में जाता है।1

अभी सितम्बर में शाहरुख स्टारर जवान आने वाली 500 करोड़ तक टच करेगी सितम्बर से अक्टूबर तक।


कोरियन फिल्में और वेब सीरीज भी आजकल भारत मे बहुत पसंद की जाती है टॉलीवुड, कन्नड़, मलयालम और तेलगु तो शुरू से अच्छे कंटेंट की फिल्में परोस रहें हैं पहले उतनी पहुंच नही थी लोगों की पर अब लोग बॉलीवुड से ज्यादा साउथ इंडियंस और अन्य रिजनल फिल्में भारतीय युवा अब ज्यादा पसंद कर रहे हैं और करना भी चाहिए कम बजट की अच्छे कंटेट को पर्याप्त ऑडियंस मिलने चाहिए

OTT ओटीटी पर रिलीज फिल्मों और वेब सीरीज की गिनती नही कर रहा हूँ इस लेख में क्यों कि ओटीटी प्रीपेड और सब्सक्रिप्शन बेस हैं।

सारे आंकड़े फिल्मी फ्राइडे डॉट कॉम, फिल्मिबात, बॉलीमूवी रिव्यु और ट्रैक टॉलीवुड  के हैं।

बॉलीवुड दुनिया का सबसे सबसे बड़ा फ़िल्म उद्योग है और भारत मे प्रतिवर्ष 20 से अधिक भाषाओं में 1500-2000 फिल्में रिलीज होती हैं।स्टेटिस्टा की एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2020 में बॉलीवुड फिल्म इंडस्ट्री की वैल्यू 191 बिलियन यानी 19 हजार 100 करोड़ रुपए दर्ज की गई थी,जो साल 2024 तक 206 बिलियन यानी 20 हजार 600 करोड़ रूपये पहुंचने का अनुमान है. इसमें से सबसे ज्यादा कमाई डोमेस्टिक थियेट्रिकल रेवेन्यू से हुई, लगभग 5 लाख लोग फ़िल्म इंडस्ट्री से जुड़े हैं यदि टॉलीवुड, कॉलीवुड और अन्य क्षेत्रीय फिल्मों की वैल्यू भी जोड़ दें तो लगभग 25 हजार करोड़ रुपये सालाना की वैल्यू है भरतीय फ़िल्म इंडस्ट्री की।

ये सारी कमाई दर्शकों की जेबों से होती है जिसमें हम सब गरीब, अमीर और मीडिल क्लास के लोग आते हैं

किसी भी फिल्म को तैयार होने में तीन चरण में काम होता है. पहला-प्री प्रोडक्शन, दूसरा-प्रोडक्शन और तीसरा होता है पोस्ट प्रोडक्शन। प्री प्रोडक्शन स्टेज में फिल्म की शूटिंग, कहानी को लेकर काम किया जाता है और प्रोडक्शन में फिल्म की शूटिंग की जाती है और तीसरे चरण में शूटिंग के बाद का काम होता है, जिसमें एडिटिंग, मार्केटिंग,प्रोमोशन आदि शामिल होते हैं।

और इस पूरी प्रक्रिया में ऐक्टर्स को मिलाकर 100 से अधिक लोगों की टीम होती है लेखक, डाइरेक्टर प्रोड्यूसर्स  से लेकर टेक्निकल टीम, लीगल टीम और स्पॉट बॉय तक 6 माह से 1 वर्ष तक काम करके एक 3 घण्टे की फ़िल्म बनाते हैं


राजनैतिक पार्टियों को बनाने और चलाने में लोकसभा, राज्यसभा से लेकर पंचायत स्तर तक की सीटों पर उम्मीदवार और पार्टी की छवि सुधारने और बनाने में बहुत खर्च लगते हैं। राज्यीय और राष्ट्रीय राजनैतिक पार्टियों की संख्या 65 से 70 हैं। गैर मान्यता प्राप्त पार्टियों की संख्या 2500 से अधिक है इन पार्टियों को लोगों से जुडने और चुनाव अभियान के दौरान सार्वजनिक बैठकों, रैलियों, विज्ञापनों, पोस्टर, बैनर, वाहनों और अन्य विज्ञापनों पर बहुत  खर्च करने पड़ते हैं।

वर्ष 2020 में भारतीय चुनाव आयोग (ECI) द्वारा लोकसभा क्षेत्रों के उम्मीदवारों के लिये खर्च की सीमा जो पहले 54 लाख से 70 लाख रुपए (राज्यों के आधार पर) थी उसे बढ़ाकर 70 से लाख-95 लाख रुपए कर दी गई थी।

और विधानसभा क्षेत्रों के लिये खर्च की सीमा 20 लाख-28 लाख रुपए से बढ़ाकर 28 लाख- 40 लाख रुपए (राज्यों के आधार पर) कर दी गई थी।


2019 के  लोक सभा के चुनाव में 60000 करोड़ ख़र्च किया गया सभी पार्टियों द्वारा जिसमें वोट को खरीदने की कीमत नहीं जोड़ी गयी है मतलब प्रति वोटर 700 रुपये खर्च किये गए जिसमें सबसे ज्यादा भारतीय जनता पार्टी द्वारा खर्च किया 

2019 लोक सभा चुनाव से भारत मे चुनाव का खर्च दुनिया का सबसे अधिक चुनावी खर्च बन गया।

 ये सारे खर्च उम्मीदवार अपने घर से नहीं लगाते बल्कि जनता से वसूले जाते हैं जिसमें हम सब गरीब, अमीर और मीडिल क्लास के लोग आते हैं

जिसके लिए सरकारे प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष टैक्सों को बढ़ाती हैं, डीजल, पेट्रोल और गैस के साथ-साथ रोजमर्रा की चीजें भी मंहगी हो जाती हैं। आम आदमी से वसूली के तमाम साधन बना लेती हैं सरकारें।


पृथ्वी पर मौजूद कुल संसाधनों का  40-45 प्रतिशत हिस्से का उपभोग सिर्फ 2-3 प्रतिशत लोग कर रहे हैं।

जबकि प्राकृतिक संसंधनो पर सम्पूर्ण मानव जाति और अन्य जीवों का समान अधिकार है।


भारत मे पिछले 1 दशक में 85-90 स्टार्टअप यूनिकॉर्न क्लब में शामिल हो चुके हैं।

जबकि सिर्फ 2021 में 42 स्टार्टअप्स यूनिकॉर्न क्लब में शामिल हुए हैं।

देश में प्रतिवर्ष अरबपतियों की संख्या बढ़ रही है वर्ष 2020 से 2022 तक 65 नये अरबपति बने।

देश की 40 प्रतिशत संपत्ति सिर्फ 1 प्रतिशत अमीर लोगों के पास है

अमीर और अमीर होता जा रहा है और गरीब और गरीब क्यों जो एक बार अमीरों की लिस्ट में आ गया वो संसाधनों और सिस्टम पर अपना अधिकार समझता है और परस्पर फायदे के लिए सिस्टम भी हर अवसर इन्हें ही देता है।गरीब और पिछड़े लोगों को अवसर नहीं मिलता कुछ नया शुरू करने पर सरकारें और सिस्टम सपोर्ट नहीं करता अवसर और समय इनके हाथ से निकल जाते है और पीछे राह जाते हैं।

इच्छाओं का अंत नहीं होता ये बढ़ती ही जाती हैं। अमीर और सफल व्यक्ति और बड़ी सफलता और अधिक सम्पति के लालच में अपनी जिम्मेदारियों और नैतिकता पर ध्यान देने से ज्यादा अधिकार बढ़ाने में जुटा रहता है।

अब बहुत कमा लिया, नाम कर लिया, सभी सुविधाएं भोग ली अब बस ऐसा कोई नहीं सोच पाता सांस चलने तक लगे रहते हैं संपत्ति जुटाने में।

ये असमानताएं ही गरीबी को गरीब ही बने रहने देती  और अति गरीबी को जन्म देती है।


हम परिवार में रहते हैं यदि बात करें संयुक्त परिवार की

तो उसमें दादा-दादी, चाचा चाची माता-पिता और भाई-बहन अमूमन 8-10 लोगों का परिवार 

अगर पिता एकलौते संतान थे तो दादा-दादी, माता-पिता और भाई बहन परिवार सिर्फ पति-पत्नी और उनके बच्चों से ही नहीं बनता परिवार हमे दूसरों के बारे में सोचना सीखता है, त्याग सिखाता है एक दूसरे का खयाल रखना सिखाता है, और कोम्प्रोमाईज़ करना सिखाता है। 

अपने बच्चों से तो दुनिया के हर लोग प्यार करते हैं अपने बुजुर्ग मां-बाप से और उनके दूसरी संतानों से भी प्यार करना परिवार सिखाता है और तभी परिवार बनता है।

हमारे सामने समाज की ऐसी तस्वीरें आती हैं जो अवाक कर देती हैं सोचने पर मजबूर कर देती हैं।

बच्चे अपने बुड्ढे माँ बाप को मेले छोड़ देते हैं, स्टेशनों पर छोड़ देते हैं घर पर सबकुछ होते हुए भी बृद्ध आश्रम में छोड़ जाते हैं।

तो कोई माता पिता अपने सोच और सपने थोप देते हैं।

तो कहीं टीचर द्वारा किया जा रहा भेद भाव या बच्चों की अनावश्यक और अति पिटाई करने का दृश्य सामने आता रहता है। कहीं न कहीं हम परिवरिश और नैतिकता में चूक रहे हैं जिस से ये घटनाएं आम हो रही हैं।

बदलाव हमेशा दिक्कत देता कुछ दिन मुश्किल होते हैं और परिवर्तन स्वीकारने में संकोच करते हैं।

अगर गांव में सड़क और खड़ंज्जे बनेंगे तो जमीम गाँव वालों की ही जाएगी हमारी और आप की ही जायेग़ी पर हमेशा के लिए ठंढ़ी, गर्मी और बरसात में आसानी से और जल्दी से हम मुख्य सड़क पर पहुंच जाएंगे हमारे स्कूल, अस्पताल और शहर जाने में सुविधा होगी साथ साथ समय की भी बचत होगी। 

किसी भी गाँव मे स्कूल, लाइब्रेरी और सार्वजनिक भवन बनेंगे तो उसका उपयोग गाँव के रहवासी ही करेंगे तो इनके बनने में सहयोग भी गाँव के निवासियों को ही करना पड़ेगा और उनका रख रखाव व देख रेख की जिम्मेदारी भी ग्राम वासियों की ही होती है।

शहरों की तुलना में गांवों में सुविधाएं बहुत कम होती है फिर भी लोग एकजुटता और भाईचारे से रहते हैं परम्पराओं, सभ्यता के पोषण के साथ साथ आधुनिकता को भी स्वीकार रहे हैं।

गांवों में हमें गरीब और गरीबी की विवशता ज्यादा देखने को मिलती है वजह है सरकारी योजनाओं की जानकारी न होना उसमें रुचि न रखना और ये योजनाएं उन तक न पहुँचना।

कई योजनाएं और सुविधाएं सिर्फ कागजों में ही रह जाती हैं असल लाभार्थी तक पहुँचती ही नहीं।

इन सब योजनाओं में समाज के हर तबके की कमाई का अंश होता है और भोगते हैं सिर्फ कुछ लोग।



चुनाव आने पर डीजल, पेट्रोल और गैस के दाम घटा दिए जाते हैं और अन्य लुभावने स्कीमें आती हैं, मुफ्त खोरी का लालच दिया जाता है। और चुनाव खत्म होते ही थोड़ा-थोड़ा कर सारी जरूरत की चीजों के दाम के बढ़ाकर पहले से काफी ज्यादा कर दिए जाते हैं। मंहगाई दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है उस स्तर से नौकरियां और सुविधायें सरकारे नहीं बढ़ाती। 

जिसका असर पिछड़े, गरीब, और मिडिल क्लास पर सबसे ज्यादा पड़ता है और जरूरत की चीज़ों के लिये भी संघर्ष करना पड़ता है।

फ़िल्म सारे जहाँ से मंहगा में संजय मिश्रा का संवाद कि मंहगाई की वजह से कितनी जरूरी चीजें हम से कब छिन गयी पता भी नहीं चला मंहगी सिर्फ चीज़ें नहीं होती बल्कि उसके साथ साथ बहुत कुछ मंहगा हो जाता है रिश्ते- नाते, हंसी और प्यार भी मंहगे हो जाते हैं रिश्तेदारी में जाना और मेहमान का आना सब मंहगा और मुश्किल हो जाता है। मन पसंद चीज़ें खाना पहनना तो दूर की बात है, जरूरतें भी पूरी करना मुश्किल हो जाता है।


मिडिल क्लास और लोअर मिडिल क्लास परिवार सबसे अधिक संघर्ष करता है जीवन मे अपनी स्थिति बनाये रखने और उस से आगे बढ़ने हेतु इस मंहगाई में वो त्रिशंकु की तरह लटके होते हैं अधर में पीछे जाना नहीं चाहते और आगे बढ़ने का मौके या तो मिलता नहीं या बहुत कम होते हैं एक्का दुक्का कोई पहुंच पाता है अच्छे पोजीशन पर ।

जैसे भारत मे गरीबी, भुखमरी की तस्वीरें हमारे सामने आती हैं वैसे ही विश्व के हर देश में में है अमेरिका, चीन, जापान, ब्रिटेन और पेरिस विकसित देशों में भी है पर बहुत कम है।

गरीबी तो वैसे ही एक अभिशाप है जरूरत भर का कुछ नहीं मिलता न भोजन न कपड़े न मकान इस कुचक्र से निकलना तो बिल्कुल असंभव है कई पीढियां  खप जाती हैं।गरीबी हर देश में है कहीं कम तो कहीं ज्यादा, दुनिया के कई देश हैं (बुरुंडी,नाइजर, लाइबेरिया और सोमालिया) जहाँ आज भी 50 से 60 प्रतिशत लोग पेट भर खाना नहीं पाते इसमें ज्यादातर देश अफ्रीका महाद्वीपीय हैं 

विश्व की सम्पूर्ण गरीब आबदी का तीसरा हिस्सा भारत मे है जबकि दुनिया के सबसे अमीर देशों की लिस्ट में शामिल है हमारा देश। वजह है बढ़ती असमानता, जनसंख्या और सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार और लूट, हमे सजग और जिम्मेदार बनकर सरकारें चुननी चाहिए जो आम लोगों में से हो और आम लोगों तक पहुंच सके गाँव और पिछड़े इलाकों को जानता और समझता हो।

या फिर कोई भी नेता हो सरकार हो उसे मजबूर करना होगा आधारभूत सुविधाओं और जरूरतों को पूरा करने के लिए

ऐसी योजनाएँ चलाई जाएं जो गरीबी और भुखमरी को खत्म करें और पहले से चल रही ऐसी योजनाओं का संचालन और क्रियान्वयन पूरे समर्पण,पारदर्शिता और ईमानदारी से हो जिससे समाज के वंचित लोगों को मुख्यधारा में लाया जा सके।

देश दुनिया भर में कृषि आधार है जीवन का। भारत में लगभग 50 प्रतिशत लोग कृषि में लगे हैं लगभग 40 प्रतिशत किसान हैं।

फल, दूध, सब्जियां, दालें व अनाज सब कृषि से आते हैं।

पूरे विश्व का भरण पोषण किसान करता है।

कृषि और कृषि सम्बंधित क्षेत्र में हजारों कंपनियां काम कर रही हैं, फल-फूल रही हैं

भारत मे पिछले 1 दशक में 85-90 स्टार्टअप यूनिकॉर्न क्लब में शामिल हो चुके हैं। जिसमें ज्यादातर कंपनियां IT और एग्रीकल्चर से सम्बंधित हैं।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार, 2017 से 2021 के बीच देशभर में कुल 28,572 किसानों ने आत्महत्या की है. जिसमें सबसे ज्यादा मौतें महाराष्ट्र में हुईं, जहां इसी अवधि में 12,552 किसानों ने आत्महत्या की है।

जब फसल आती है तब भाव बहुत कम मिलते हैं और ऑफ सीजन में भाव बढ़ जाते जाते हैं देश मे सार्वजनिक स्टोरेज व सार्वजनिक कोल्ड स्टोरेज की उपलब्धता न के बराबर है और कृषि में उपयोग होने वाले साधन और इनपुट इतने महंगे कि किसान फसल उगते और कटते ही बेचकर परिवार का खर्च चलाने और कर्ज उतारने में लग जाता है। और फसल की उचित कीमत नहीं मिल पाती। किसान को मिलने वाली सब्सिडीज और अन्य सुविधाओं का अधिकारी और नेता बंदरबांट करते हैं।
किसान क्रेडिट कार्ड और दूसरे स्कीमो में भी किसान को ठगा जाता है। दूसरों का पेट भरने वाला किसान कई बार भूखे सो जाता है बच्चों के फीस समय पर नहीं भर पाता, बच्चों के लिए अच्छे कपडे और खिलौने नही खरीद पाता। अगर मौसम खराब हो ज्यादा बारिश हो जाये या सूखा पड़ जाए तो किसान को खुद खाने के लिए अनाज नहीं होते और न ही परिवार का खर्च चलाने के लिए पैसे ऐसे में किसान कर्ज कैसे भरेगा ऊपर से बार बार कर्ज वसूली की धमकियां इन सब से तंग आकर आत्म हत्या करना ही अंतिम उपाय नजर आता है।

किसी के साथ गलत हो रहा हो, कोई किसी को पीट रहा हो छेड़ रहा हो तो वहां मौजूद लोग वीडियो बनाते हैं किसी  हाइवे पर कोई दुर्घटना होती है तो लोग इगनोर कर के चले जाते हैं या फिर वीडियो बनाकर सोशल साइट्स पर पोस्ट कर देते हैं

अगर वहाँ मौजूद लोग सही समय पर सक्रिय रहे और समय पर हॉस्पिटल पहुंचाए तो ऐसे कई दुर्घटनाओं में लोगों की जान बचाई जा सकती है। आप मदद नहीं कर सकते तो आसपास के लोगों को बुलाएं अन्य लोगों की मदद ले एम्बुलेंस और पुलिस को कॉल कर के दुर्घटनाग्रस्त जगह पर बुला लें ऐसा करना हमें जिम्मेदार और अच्छा इंसान बनाता है किसी की जान बचाने और अन्य लोगों को भी सजग और जिम्मेदार बनाता है किसी का जीवन बचाना किसी के काम आना ही जीवन है यह हमें अंदर से ख़ुसी देता है और ऊर्जा से भर देता है।

देश-विदेश में और हमारे आस पास भी ऐसे बहुत सारे एनजीवो और संस्थाए हैं जो विविध विषयों और समस्याओं पर काम कर रही हैं और पिछड़े, गरीब, कमजोर, दिव्यांग, अनाथ और असहाय लोगों के हित और विकास के लिए कार्यरत हैं।

बहुत सारे लोग, गरीबी, जातिवाद, भेदभाव को दूर करने के नाम पर पिछड़ों को हक़ दिलाने के नाम पर उनके विधाता बने बैठे हैं और खुद मंहगी गाड़ियों और बड़े-बड़े घरों के मालिक बने बैठे हैं। हजारों रुपये रोज का खर्च है।

कुछ लोग ही होते हैं जो ईमादारी और समर्पण से कार्य करते हैं। इन्ही अच्छे बुरे के संतुलन से संसार चल रहा है बुराई इतनी व्यापक नहीं हुई अभी अच्छाई भारी है अभी बुराई पर।

दुर्जनों की दुर्बलता से समाज को उतना नुकसान नहीं होता जितना कि सज्जनों की निष्क्रियता से होता है।

सरकारें और पार्टियां सिर्फ लुभावने मनीफेस्टो बनाती हैं उसे पूरा किसी भी कार्यकाल में नहीं करती तमाम योजनाएं सिर्फ पैसे निकालने और खुद पर व पार्टी पर खर्च करने के तरीक़े होते हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर, पावर, पानी, हेल्थ और एजुकेशन पर भी जरूरत के अनुरूप कार्य नहीं होता, गरीबी और भुखमरी मिटाने की योजनाओं से भी पार्टियां और नेता खुद के बड़े पेट भरने में लगे रहते हैं अगर कुछ अच्छे, सजग व सक्रिय नेता और ब्यूरोक्रेट्स अच्छा करते हैं तो उन्हें करने नहीं दिया जाता।

आज दुनिया मे स्ट्रेस, और एंजोईटी हमारे जीवन का हिस्सा बन गए हैं। हमारी महत्वाकांक्षाएँ और लालच बढ़ते ही जा रहे हैं। कामयाबी, अमीरी और प्रसिद्धि की ऐसी होड़ लगी है। कि सही गलत का खयाल ही नहीं आता, संस्कार और भावनाओं को जगह ही नहीं मिल पाती। 

हम और आप जैसे ही सफल होते हैं बड़ा पद व प्रतिष्ठा मिलने पर भेद भाव करने लगते हैं और अपना क्लास बना लेते हैं, हमारे अधीनस्थ लोगों से दुर्व्यवहार करने से नहीं चूकते हमारी इच्छाएं बढ़ती ही जाती हैं, इतना कुछ होते हुए भी अपने से कमजोर और जरूरत मंदो के हिस्से को भी झपटने से नहीं चूकते।

 "पूत सपूत तो क्यों धन संचय पूत कुपूत तो क्यों धन संचय" जिन संतानों के लिए किसी का हक छीनकर या मेहनत और ईमानदारी से धन का संचय कर रहे हैं अगर उसे अच्छे संस्कार दे और काबिल बनाए तो वो स्वयं कमा लेगा और सफल होगें और यदि  वो कुपुत्र है अर्थात  काबिल और संस्कारी नहीं तो हमारे संचय किये हुए धन को व्यसनों और मौज मस्ती में उड़ा देगें और हमारा किया हुआ धन बेकार जाएगा ।

हम सब को पता है एक दिन सब को सबकुछ छोड़ कर जाना है खाली हाथ जाना है  हमारे अच्छे कर्म ही रहेंगे और शादियों तक याद किये जायेंगे ।


-श्याम नन्दन पाण्डेय

मनकापुर, गोण्डा, उत्तर प्रदेश

सोमवार, 27 फ़रवरी 2023

लेख-भौतिकवाद, प्रकृतवाद और हमारी महत्वाकांक्षाएं

 भौतिकवाद, प्रकृतिवाद और हमारी महत्वाकांक्षाएं


सुदूर गाँव और जंगलों मे बैठा कोई बुजुर्ग व्यक्ति और उसका परिवार जो खेती बाड़ी करता है, गाय, भैंस और बकरियों चराता है,हाथ मे स्मार्ट फोन नहीं, परिश्रम कर के, दाल रोटी खा कर सो जाता है और अगली सुबह फिर वही दाल या दही रोटी खाकर रोज के काम मे लग जाता है,

पैरों में चप्पल भी नहीं होते, छोटे मोटे कांटे टूट जाते हैं पैरों मे चुभते ही, "परिश्रम कर के शरीर मजबूत बनता है और अभ्यास से दिमाग"

उसने कोई महानगर और मैट्रो सिटी नहीं देखीवो देखता है बछड़े और पिल्ले को जन्मते हुए, पशु- पंक्षियों को बतियाते हुए,

देखता है पशुओं को पगुराते हुए और चिड़ियों को दाना चुगते और घोषला बनाते और डूब जाता है खामोशी में कभी मन्द मुश्कुरते हुए कभी कुछ चिंता और बेचैनी की सिकन लिए चेहरे और माथे पर।

उसका एक धर्म है प्रकृति के साथ रहना प्रकृति के साथ जीना ,खुद का और परिवार का भरण पोषण

वो इतना जानता है कि धरती पर उसी की एक जात ऐसी है जो बोलता है, समझता है प्रतिक्रिया देता है दूसरे जीवों और प्रकृति का संरक्षण कर सकता है,

जो जैसा हो रहा है वैसा होने देता है, प्रकृति में प्रकृति के साथ रहता और जीता है, वो चाहता है धरती सदा धरती बनी रहे उसका विज्ञान अलग है।

उसे क्या पता आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस(AI-गूगल असिस्टेंट, एलेक्सा आदि),स्पेस साइंस एंड टेक, रोबोटिक्स, टेशला, चंद्रयान, मंगलयान, आधुनिक तकनीक और विज्ञान,ग्रेविटी, रोज आने वाले नए सॉफ्टवेयर और एप्प,अंतरिक्ष मलबा(अंतरिक्ष मे मौजूद 8000टन से अधिक कचरे) और रूस यूक्रेन युद्ध और इन सब के प्रभाव।


उसे कोई फर्क नही पड़ता कि हजारों, करोङो और अरबों वर्ष बाद उसके वंशज धरती पर रहेंगे या चांद व अन्य किसी ग्रह पर जाकर बसेरा करेंगे।

उसके बच्चे पढ़े आस पास के प्राइमरी और इंग्लिश मीडियम स्कूलों में, और पोते तो और बड़े और मंहगे स्कूलों में पढ़ रहे हैं।

कच्चे और घास फूस के घर ईंट और कंक्रीट के घरों में बदल रहे हैं उसी के सामने।

उसके पुर्वजों ने जिया बहुत ही साधारण जीवन तकनीक और विज्ञान के बहुत पहले और इसके बिना और अब वो भी जीता है वैसे ही सामान्य जिंदगी।

नदियां, झरने पहाड़, जंगल सब के साथ यथा स्थिति रहता है  संयमित उपभोग भी करता है।

शायद वो देखा ही नही ख्वाब बंगलों और गाड़ियों का शॉपिंग मॉल्स में खरीदारी का मैक डी, पिज्जा हट और सी सी डी के स्वाद को चखने का।

खेती और चारागाह के लिये जमीन भी कम हो रहे हैं,

सामान के बदले सामान की प्रथाएं लगभग खत्म हो गई मंहगाई उसके घरों और रोज के जरूरत की चीजों में भी घुस गई।

नमक, माचिस और पानी के सस्ते पन पर नाज था अब वो भी ब्रांडेड हो गए।

दादा दादी और नाना नानी की कहानियां, संस्कार,सत्संग  और सज्जनता से अब पेट भी नही भरा जाएगा ।

"हमे फ्यूचरिस्टिक और पैसिसनेट होना पड़ेगा।"


कुछ लोगों की महत्वाकांक्षाओं, जिज्ञासा और रुचि ने हमे हमारी ब्रह्मांड,धरती, जीवों औऱ खुद के अस्तित्व को जानने और समझने में मदद की और जीवन को आसान बनाया

बहुत सारे पूरातत्ववादी, प्रकृतिवादी और वैज्ञानिक ने पूरा जीवन लगा दिया इसे समझने में।

वर्ष 1700 के अंत तक अधिकांस लोगों का यही मानना था कि पृथ्वी 6000 वर्ष पुरानी है।

चार सौ वर्ष पहले जर्मन जियोरजियस एग्रिकोला दुनिया के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने खनन के काम को वैज्ञानिक नजर से देखा । उन्होंने अपनी सारी जिन्दगी खदानों में बिताई और जमीन के नीचे से निकले खनिजों का अध्ययन किया 

फ्रेंच प्रकृतिवादी और जीव वैज्ञानी जौरसिस कूवये ने जीवो और पौधों का वर्गीकरण किया।


स्विटजरलैंड में एक वैज्ञानिक थे जिनका नाम था गैसनर उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं जिसमें उन्होंने प्रकृति में पाई जाने वाली सभी चीजों का वर्णन किया गैसनर पहले व्यक्ति थे जिन्होंने फॉसिल (जीवाश्म ) के चित्र बनाए ।


गैसनर ने विभिन्न पौधों और जानवरों को अलग - अलग समूहों में रखा । कुछ जानवर अन्य जानवरों से मेल खाते हैं और कुछ पौधे अन्य पौधों से मिलते - जुलते हैं । शेर , चीते और बिल्लियां एक - दूसरे से बहुत मिलते - जुलते हैं वहीं लोमड़ी , भेड़िए और कुत्ते भी एक - दूसरे से बहुत मिलते - जुलते हैं । गाय - भैंस , भेड़ और बकरियों के खुर होते हैं और वे सभी घास खाते हैं और एक - दूसरे से बहुत मिलते - जुलते हैं ।


उदाहरण के लिए सींग और खुर ज्यादातर पौधे खाने वाले (शाकाहारी) जानवरों में पाए जाते हैं । किसी मांसाहारी जानवर के सींग और खुर नहीं होते । मांसाहारी जानवरों के विशेष प्रकार के दांत होते हैं जो शाकाहारी जानवरों में नहीं होते । कूवर्य की खोज के अनुसार हम किसी जानवर के शरीर के छोटे से भाग से मात्र एक दांत से भी उस जीव के बारे में बहुत कुछ जान सकते हैं ।

पृथ्वी पर उपस्थित और विलुप्त सभी जीवों को उनके गुणधर्मों के आधार पर  प्रजाति (स्पेसीज़) औऱ वंश (जीनस) में बांटे जिनसे उनके अध्ययन में आसानी हुई।

स्वीडिश प्रकृतिवादी कैरोलस लीनियस ने प्रत्येक पौधे और जानवरों को दो लैटिन शब्दों का नाम दिया जिसमे पहला शब्द उसके वंश(जीनस) और दूसरा उसके प्रजाति (स्पेसीज़) को दर्शाता है

स्तनपायी (मैमल्स) सरीसृपों ( रेप्टाइल), पंक्षी और मछलियां स्पेसीज़ का पता लगाया जा सका और इनका अध्ययन आसान हुआ।

लाइलाज बीमारियों के इलाज मिले बीमारियां का डाइग्नोसिस और उपलब्ध मेडिसिन और उपकरणों से उम्र बढ़ी, हाई स्पीड वाहनों से दूरियां कम हो गईं, टेलीफोन और स्मार्ट फोन से कम्युनिकेशन बढ़ा 

पर "अति हर चीज की बुरी है" असल में हम आदी हो गए दवाईयों के, हर काम जल्द खत्म करने के और मोबाइल फोन्स के।

चार लोग इकट्ठा बैठे तो होते हैं, पर एक दूसरे से बात करने, कुशल क्षेम पूछने और हंसी मजाक करने के बजाय व्यस्त होते हैं अपने अपने फोन में दुःख की बात तब और होती है जब हम चार लोगों में एक के पास फोन ही न हो या उसके पास जो फोन है वो स्मार्ट न हो तो वो बिल्कुल अकेला हो जाता है।

जैसे ही मेडिकल साइंस और हेल्थ केयर विकसित हुए उसी अनुपात में नई बीमारियां भी बढ़ी, दूरियां समय कम करने होड़ में हाई स्पीड और यातायात नियमों के न पालन की वजह से सड़क दुर्घटनाएं भी बढ़ी।

अब हम बहुत आगे निकल आये मशीनों और उपकरणों से घिरे हैं। हमारी इच्छाएं अति में बदलने लगी हैं, खेतों में आवश्यकता से अधिक खाद और कीटनाशक डालने लगे, परिवार में हर सदस्य को चलने के लिए खुद की गाड़ी चाहिए, हाथ पैर न चलाना पड़े इसलिए हर काम को करने की मशीन चाहिए।

खाद केमिकल्स और दवाईयां उपचार के लिए नहीं बल्कि व्यापार के लिए बनाई जा रही हैं।

हम रोज थोड़ा थोड़ा जहर खा रहे हैं खेतों में केमिकल्स और रासायनिक खादों की बोतलें और पैकेट्स के ढेर लगे होते हैं।

कंपनियां दुकानों बाजारों के साथ साथ गांवों तक जाकर मार्केटिंग और सेल करती हैं अपने प्रोडक्ट को

फिर इन जहर से उत्पादित उत्पाद(फल, सब्जियां, अनाज और दूध) भी हमारे ही हिस्से आता है जबकि समृद्धि और कंपनियों के मालिक IPM, ऑर्गेनिक और नेचुरल उत्पाद ही खाते हैं। 

हमारी अति महत्वाकांक्षाओं की वजह से प्रकृति का संतुलन बिगड़ रहा है जिसकी वजह से पर्यावरण व जमीन पर पड़ रहे दुष्परिणाम के नतीजे का भुक्तभोगी ये सीधे साधे लोग भी होंगे जो जाने अनजाने में कभी भी प्रकति के नियमो के विरुद्ध नहीं गये और प्रकृति के साथ जीवन यापन कर रहे हैं।

घरो और दफ्तरों में ए सी और कारों से पेट्रोल, डीजल और गैस के दोहन के साथ साथ पर्यावरण को नष्ट  कर रहे हैं, पृथ्वी पर प्लास्टिक और अन्य अनावश्यक कचरे का नया हिमालय खड़ा कर रहे हैं।

प्राकृतिक संसाधनों का अति दोहन सीमित संसाधनों में कमी के साथ साथ पर्यावरण को भी छति पहुंचा रहा है।

पृथ्वी पर मौजूद कुल संसाधनों (संपत्तियों) का  40-45 प्रतिशत हिस्से का उपभोग सिर्फ 2-3 प्रतिशत लोग कर रहे हैं।

प्राकृतिक संसंधनो पर सम्पूर्ण मानव जाति और अन्य जीवों का समान अधिकार है।

"प्रत्येक मानव निर्मित उत्पाद प्राकृतिक संसाधनों से ही बना होता है"

इन जैविक अजैविक संसाधनों को बनने में लाखों वर्ष लगे,

ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि इस शदी अर्थात अगले 50 से 120 वर्षों में तेल कोयला और प्राकृतिक गैस समाप्त हो जाएंगे ।

डेवलपमेंट और आधुनिकीकरण के नाम पर पिछड़े और कमजोर लोगों का हक और संसाधन छीना जा रहा है ये सब सिर्फ उन्हीं 5 से 10 प्रतिशत लोगों के लिए है।

हमारी छुधा और तृष्णा है कि भरती ही नहीं है।

हमें प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कम से कम करना चाहिए इन्हें बनने बहुत उथल पुथल और लाखों वर्ष लगते हैं।


हमें अपने कमाई का कुछ हिस्सा उनके लिए जरूर रखना चाहिए जो पिछड़े है जाने अनजाने में जिनका हक हमने कन्ज्यूम किया और जिन्हें हमारे सहारे की जरूरत है।



-श्याम नन्दन पाण्डेय

 मनकापुर, गोण्डा, उत्तर प्रदेश

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2023

शुरुआत जरूरी है

 शुरुवात जरूरी है…!!

मन में है जो, वो बात जरूरी है
छा रहा अँधेरा घोर,
अब हर चिराग जरूरी है.

बदल रही है दुनिया सारी, बदल रहा प्रकृति भी
तेज नही धीरे ही सही,
पर बदलाव जरूरी है..
झूठी शान और परंपरा का,
बहिस्कार जरूरी है..
कोई डरा रहा ,कोई सहमाँ है,
कोई मूक,कोई वाचाल यहाँ
ध्वस्त करो यह रूढ़िवाद,
अब पुनरुत्थान जरूरी है..
मंजिल मिले या हार
ये बाद में तय होगा,
ठहरे रहे बहुत,
अब प्रस्थान जरूरी है..
जो होगा सो होगा अंजाम,
मगर आगाज जरूरी है..!
कुछ भी नहीं असंभव
बस शुरुवात जरूरी है…

कविता-दंगा पीड़ित

 कविता  दंगापीड़ित ये भी था इक सपना, कि समाज से लुक भी प्यार मिले... पर मिली किताबें दुस्वारियां, और दोस्ती के घाव मिले... पल रहे हैं शिवरों...